मेरी कलम

  • Sept-2012
    जब मौत हमारी मंजिल थी

    जब मौत हमारी मंजिल थी, जीने का इरादा कर बैठे
    हर चोट पिरोई माला में, सिलने का हुनर हम अब सीखे

    जब ह्रदय घिसा उस पत्थर पर, आंसू की धारा बह निकली
    वो वक़्त रहा कुछ देर मगर, नदिया पीना हम अब सीखे

    जब भीड़ हमारी साथी थी, आवाजे ही आवाजे थी
    अब मौन अकेला खड़ा हूँ मैं, चिंतन का हुनर हम अब सीखे

    कर्तव्य बोध जब हमें हुआ, जिन्दा है हम तब पता चला
    इक नयी डगर, इक नया सफ़र, चलने का इरादा कर बैठे

    १२ सितम्बर २०१२
    अविनाश कुमार सिंह

  • Sept-2012
    हमने तुमको, अपना कहना छोड़ दिया

    रुसवा ना मोहब्बत हो जाएँ, तेरा नाम ही लेना छोड़ दिया
    हमने तुमको, अपना कहना छोड़ दिया

    तू ना थी तो तस्वीर तेरी लेकर हम सोया करते थे
    अब ये भी मुनासिब हो ना सका, ख्वाबो में बुलाना छोड़ दिया

    मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, सब जाके हमने देख लिए
    पत्थर के खुदा है सब, अब सर को झुकाना छोड़ दिया

    मैखाने की बात ना कर, मुझसे वाइज़
    जब से दिल गमगीन हुआ है, सारा ज़माना छोड़ दिया

    तेरी रांहे तक-तक कर, ये आंखे बंज़र हो बैठी
    तू फिर से ना ओझल हो, पलकों ने झपकना छोड़ दिया

    १४ सितम्बर २०१२
    अविनाश कुमार सिंह

  • Sept-2012
    ये रिश्ते

    जब साथ हमारा छुट गया, विश्वास का धागा टूट गया
    हर खवाब नया बुनता था जो, सपनो का सांचा टूट गया

    जीवन तो समंदर जैसा है, तूफान का भी आना वाजिब है
    जो पार लगाने वाला था, माझी वो हमसे रूठ गया

    खुशिया और गम दोनों चुन के, रिश्तो की माला गुथी थी
    इक छोर पकड़ में खड़ा रहा, वो छोर छुड़ा कर चला गया

    हम दोनों थे दो रंग मगर, मिलके फिर हम एक बने
    मैं अब भी तुमसे रंगा हुआ, पर रंग हमारा छुट गया

    ***
    रिश्ते भी पौधो जैसे हैं, दोनों में कोई फर्क नही
    दोनों को लगती भूख प्यास, दोनों को बनाना पड़ता है
    पौधो को बीमारी से जैसे, रिश्तो को ज़माने से
    कैसे भी हो मुमकिन, दोनों को बचाना पड़ता है
    ***

    १७ सितम्बर 2012
    अविनाश कुमार सिंह

  • Sept-2012
    मैं अकेला रह गया

    ख्वाब, चाहत, ख्वाहिसे, सब छीन के तुम ले गए
    मैं यहाँ बाकि अकेला रह गया

    शाम तक खेली थी खुशियाँ जिस मकां की ओट में
    रात होते ही वहा, गहरा अधेरा रह गया

    कहकसा भी अब तरसती चाँद को
    अब गगन में बादलों का बस बसेरा रह गया

    जिंदगी की ये अमावस और भी लम्बी हुई

    जब से अपने दरमियाँ का फासला चौड़ा हुआ

    रूह भी अब तो रिहाई मांगती है
    यूँ सिसकने का की अब ये, मामला लम्बा हुआ

    "पल दो पल का साथ था, ये सोच कर उसे भूल जा
    अब फकत ये मान ले, जो भी हुआ अच्छा हुआ "

    ३० सितम्बर २०१२
    अविनाश कुमार सिंह

  • Sept-2012
    मैं तेरे शहर से गुजरा, तुझे पता ना चला

    मैं तेरे शहर से गुजरा, तुझे पता ना चला
    हवा बनके छुआ तुझको, तुझे पता न चला

    तुम तो सोई हुई थी, बड़े इत्मिनान से
    मैंने हौले से तुम्हे चुमा, तुझे पता न चला

    जुल्फ उलझी हुई थी तेरी, किसी के इन्तेज़ार में
    तेरी जुल्फों को संवारा, तुझे पता ना चला

    बैठ के पास तेरे, घंटो गुफ्तगू की
    रात आँखों में कटी कैसे, हमें पता न चला

    अब तुझे छोड़, तेरे खवाबो में, मैं चला
    मैं तुझे मिलने था आया, तुझे पता न चला

    22 सितम्बर 2012
    अविनाश कुमार सिंह

  • Dec-2012
    इक साल में ही कैसा, मंजर बदल गया

    इक साल में ही कैसा, मंजर बदल गया
    जो था रकीब कल तक, संगदिल निकल गया

    रक्खे ईमान को कोई, कब तक संभाल कर
    जब सब बदल रहे थे, वो भी बदल गया

    आया जो सर्द मौसम, सब फूल गिर गए
    हस्ता हुआ चमन था, बिरान हो गया

    हम भी किरायेदार थे, दिल के मकान के
    लगता है अब वहां पे, कोई और आ गया

    हम आज भी वहीँ है, तुम आज भी वहीँ
    जज्बा जो हमको जोड़ता, जज्बा बदल गया

    रंजीश न कोई तुमसे, शिकवा नही कोई
    जिस वक़्त ने मिलाया, उसने जुदा किया

    26 दिसम्बर 2012
    अविनाश कुमार सिंह

  • Jan-2013
    इक उम्र का हिस्सा हमने, तेरे साथ गुजारा है

    इक उम्र का हिस्सा हमने, तेरे साथ गुजारा है
    तू पास नही तो क्या, तू अब भी हमारा है

    तुम चाहे जहाँ जाओ, तुम्हे लौट के आना है
    पर्वत भी हमारा है, सेहरा भी हमारा है

    गर साथ चले होते, मंजिल भी मिली होती
    इस राहे मोहब्बत का, दस्तूर निराला है

    गैरों की बातों में, घर टूट गया अपना
    कुछ दोष तुम्हारा था, कुछ दोष हमारा है

    रहते थे कभी हम भी, तेरे दिल की धड़कन में
    कल और ठिकाना था, अब और ठिकाना है

    15-जनवरी-2013
    अविनाश कुमार सिंह

  • Feb-2013
    अबकी जब तुम वापस आओै

    अबकी जब तुम वापस आओ, दो नैना भी ले आना
    कब से काला देख रहा हूँ, कुछ रंग उठा कर ले आना

    धड़कन भी चलती है, जिन्दा भी हूँ, पर कुछ महसूस नही होता
    अबकी जब तुम वापस आओ, एहसास उठा कर ले आना

    ना जाने क्यू सब भिगा- भिगा है, ये बारिश का मौसम भी जैसे टिक कर बैठा है
    अबकी जब तुम वापस आओ, धूप उठा कर ले आना

    मुददत का जागा हूँ, मुझ को भी थोडा चैन मिले
    अबकी जब तुम वापस आओ, नींद उठा कर ले आना

    मेरी सारी अरदासो का इक तू ही तो हासिल है
    अबकी जब तुम वापस आओ, फिर जाने को मत आना

    22-फ़रवरी-2013
    अविनाश कुमार सिंह

  • Apr-2013
    इक उम्र का हिस्सा हमने, तेरे साथ गुजारा है

    इक बिंदिया, काजल, इक पायल, कुछ और निशानी रक्खी है
    अब भी तेरे आने की, उम्मीद बचा कर रक्खी है

    सुने घर में दीवारों से, कब तक कौन करे बातें
    इस बाबत, इक कोने में,तेरी तस्वीर लगा कर रक्खी है

    कुछ तेरी, कुछ मेरी बातें, अब भी गुंजा करती है
    लम्हों की संदूकी में,तेरी याद सजा कर रक्खी है

    कोई और नही जचता, काफीर सी निगाहों में मेरे
    बस तेरे तस्सवुर को, पलकों ने रजा दी है

    १९ अप्रैल २०१३
    अविनाश कुमार सिंह